Saturday, May 23, 2009

main apne andheron me, kis tarah tumhe bhi pukaar loon??

this was in response to that hemant kumar song - tum pukar lo, tumhara.... intezar hai. this is an argument against any such pukar... :)

मैं अब वक़्त के काटने के कारोबार में हूँ
मैं दिन को शाम शाम से रात
और रात भर किसी सुबह कि फ़िराक़ में हूँ
मैं ये जो पल पल बस जज़ा की इंतज़ार में हूँ
मैं इन अंधेरों में किस तरह तुम्हे भी पुकार लूँ?

मैं पाप और पुण्य के फर्क से होशियार तो हूँ
पर मैं सब की खुशी घर की शान्ति के लिए
सही को ग़लत ग़लत को सही झूठ को सच कहने को तैयार भी हूँ
मैं ये जो फिर एक नए पतन की कगार पर हूँ
मैं इन अंधेरों में किस तरह तुम्हे भी पुकार लूँ?

मैं इस हाल पर कुछ सोगवार तो हूँ
पर मैं सपनो के छल में, जज़्बों के तर्क में
एक भयानक आने वाले कल के डर में गिरिफ्तार भी हूँ
मैं ये जो शामिल तिल तिल कर ख़ुद अपनी हार में हूँ
मैं इन अंधेरों में किस तरह तुम्हे भी पुकार लूँ?

मैं चाह कर भी
अपने अंधेरों में
क्या सोच कर
तुम्हे
भी पुकार लूँ?

No comments: