Friday, October 17, 2008

dil ki vaadi me

I really like this poem narrated by yash chopra in Veer Zaara, I actually like his taste in poems usually so this is no exception...

its a pretty poem and i love it even more as Mr. Chopra's narration, there is something very rustic and earthy about his voice and diction. lovely.

एक दिन
सवेरे सवेरे
सुरमई से अंधेरे की चादर उत्तारे
एक परबत के तकिये से
सूरज ने सर जो उठाया
तो देखा
दिल की वादी में
चाहत का मौसम है
और
यादों की डालियों पर
अनगिनत

बीते
लम्हों की कलीयाँ
महकने
लगीं हैं।

and then something.... i forget...

to..

हाँ वही जिंदगी,
जिसके दामन में कोई मोहब्बत भी है
कोई हसरत भी है
पास आना भी है
दूर जाना भी है
और ये अहसास है
की वक्त
एक झरने सा
बहता हुआ

चला जा रहा है
ये कहता हुआ
की
दिल की वादी में
चाहत का मौसम है
और
यादों की डालियों पर
अनगिनत

बीते
लम्हों की कलीयाँ महकने लगीं हैं

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